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गाजा की लड़ाई के वास्तविक मुद्दे

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गाजा की लड़ाई के वास्तविक मुद्दे डॉ. रिचर्ड बेंकिन
अमेरिकी पत्रकार

गाजा मे जारी लड़ाई के दौरान विश्वभर से प्रतिक्रिया आयी। सभी ने अपने अपने ढंग से अपनी बाते रखी परंतु बहुत कम लोगो को इस बात की जानकारी है की युद्ध के मुख्य मुद्दे क्या है और बहुत कम लोग इस बात को स्वीकार करने को तैयार है कि उनको इसकी जानकारी नही है। अधिकतर लोगो को गलतफहमी है कि मध्य पूर्व समस्या की वजह इजरायल है जो वास्तविकता से परे है।

जब से यहुदियो के देश का निर्माण हुआ है तब से अरब और विश्व के अन्य देश इस सच्चायी को स्वीकारने को तैयार नही है कि इजरायल एक हकीकत है न कि अफसाना। यही बाद संसार के सभी मस्जिदो और मध्य पूर्व के मस्जिदो से तो खासतौर पर दोहरायी जाती है कि यहुदियो के रहने की जगह नही है। कुछ इमाम तो गैर यहूदी राष्ट्र की वकालत करते नजर आते है। सच्चायी यह भी है कि इस तरह की घोषणाये अरब के सरकारी प्रचार माध्यमो से भी की जाती है। यानि वहा की सरकार और इस्लामिक नेता ऐसी नीतियो को बढावा देते है। अरब के नेताओ ने इस तरह की बयानो को खुली तौर पर कभी भी आलोचना नही की है, यानि उनका मौन समर्थन रहता है।अगर आप सच्चाई जाने बगैर इसे अधिग्रहण का मामला मानते है तो गलत होगा। आम लोगो को लगता है कि जार्डन नदी के इलाके पर इजरायल ने कब्जा कर रखा है पर सच्चाई इसके उलट है। ऐसा कभी नही था। यह उन लोगो की इच्छा की मह्ज उपज मात्र है जिन्हे हम फिलिस्तीन कह्ते है।

यह पश्चिमी किनारे और गाजा के बीच का मामला है जिसके दोनो किनारो पर फिलिस्तीन देश है। जेरुशलम इजरायल की राजधानी है।यह स्थिति 1948 1967 के बीच का है, दोनो स्थान कब्जा किया हुआ है, पश्चिमी भाग और येरुशलम पर अरब और जार्डन का कब्जा था और गाजा पर मिस्त्र ।1950 मे तो जार्डन इसे अपना भाग मानने लगा था। जब इजरायल जेरुशलम के बारे मे कोई टिप्पणी करता है लोग उसके विरुद्ध अवाज उठाने लगते है पर वही जार्डन के मामले पर चुप्पी साध लेते है। इसका कारण साफ है इजरायल के विरुद्ध जिहाद जारी रखने के लिए अपने सिद्धांतो की तिलांजली देने को भी तैयार रहते है।जब 1964 मे पीएलओ की स्थापना हुई फिलिस्तीन के रास्ते रुकावट इजरायल ने नही जार्डन और मिस्त्र ने की। ये हमस और फतह कभी भी इस बात का जिक्र नही करते है कि जार्डन और मिस्त्र ने उनके जमीन पर नजायज कब्जा कर रखा है और उसको स्वीकारने मे भी अनाकानी करते है। इनका शत्रु इजरायल है न कि मिस्त्र और जार्डन इसलिए इजरायल कुछ भी करता है तो उसको जोर शोर उठाने लगते है इसकी मूल वजह है 1967 से पहले जो स्थिति उसको वापस पाना चाह्ते है। पीएलओ की चार्टर 24 के अनुसार पीएलओ को पश्चिमी किनारे, गाजा और जार्डन के भूभाग पर कोई क्षेत्रीय प्रमुत्व हासिल नही है। पीएलओ के पहले नेता अहमद सुखारी ने 31 मई 1956 को यूएनओ को बताया कि लोगो के जानकारी के अनुसार फ़िलिस्तीन कुछ भी नही दक्षिणी सीरिया का भाग है। 1950 मे स्थापना के वक्त से ही  पीएलओ और फतह ने कभी भी येरुशलम पर अपना दावा नही जताया। 1967 के 6 दिवसीय युद्ध से पहले पीएलो के चार्टर मे फिलिस्तीन देश के नाम का जिक्र तक नही है।इस युद्ध के बाद पीएलओ ने अपने चार्टर मे संशोधन करके फिलिस्तीन की मांग रखी जिसमे येरुशलम का भाग भी शामिल था। कब्जा करने की यह रणनीति सिगरेट के धुआ की तरह धुन्धला दिखायी देती है। अगर हम फिलिस्तीन के मूल योजना पर नजर डाले तो और स्पष्ट हो जायेगी। यूएन के मूल योजना के तह्त पश्चिमी किनारा, गाजा और 1967 के पहले के इजरायल के कुछ भागो को लेकर फिलिस्तीन बनेगा। इस बटवारे की योजना मे येरुशलम का अंतराष्ट्रीयकरण हो गाया। लेकिन सभी अरब देशो ने इसको नकार दिया क्योकि इससे यहूदियो के अलग राष्ट्र के लिए जगह मिल जाती इसी से जाहिर होता है कि अरब देशो का इजरायल के प्रति वास्तविक नजरिया क्या है।

2000 मे इजरायल ने पश्चिमी किनारे के 95 प्रतिशत भाग फिलिस्तीन को और चार प्रतिशत भाग अपने हिस्से मे रखने का प्रस्ताव दिया था जिसे फिलिस्तीन ने अस्वीकर कर दिया। अराफत के समर्थको ने इसे बंतुस्तान कहा लेकिन इस पर विचार करने से भी इंकार कर दिया। यह देखते हुए कि फिलिस्तीन को जो मिला और अरब देश उसे क्या देना चाह्ते है इनकी नजर इजरायल की क्या वैधता से  है इसी पर इस समस्या का समाधान निर्भर है। अरब देशो के लोग अपने आप से पूछे कि यदि इजरायल गाजा और पश्चिमी तट से हट जायेगा तो क्या ये फतह और हमस के लोग हथियार से तौबा कर लेंगे। जबाब होगा नही अगर येरुशलम से भी हट जायेगा तब भी ये हथियार नही डालेंगे। जब येरुशलम पर अरबो कब्जा हो जायेगा तब ये यहूदी को प्रार्थना करने नही देंगे। येरुशलम पर इजरायल कब्जा है इसी वजह से मुसलमान मौंट्स अले अक़्सा मस्जिद मे नमाज पढ पा रहे है। यहा मुसलमानो ने मस्जिद के अन्दर मस्जिद का निर्माण कर लिया है। फिर भी इजरायल ने कोई आपति नही उठायी है। अगर इजरायल गाजा , पश्चिमी किनारे और येरुशलम से हटने को राजी हो जाता है तो और अपने पवित्र स्थल पर प्रार्थना का अधिकार चाहता है तो क्या उसे मिलेगा। नही ? 1948 मे जिन यहुदियो को अरब से भगा दिया गया था उनके अधिकार के बारे मे कोई बात नही करता भगाये गए अधिकतर आज इजरायल के नागरिक है उनके बारे मे कोई चर्चा नही होती है। कैम्प डेविड समझौते के अंतर्गत इजरायल सीमित संख्या मे फिलिस्तीनियो को अपने देश मे शरण देना स्वीकार कर लिया था। इसी वजह से यह युद्ध हो रहा है ताकि इजरायल के अस्तित्व को नकारा जा सके। इसमे अरब देशो का भी सहयोग फतह और हमस को मिलता रहता है। हमस का इजरायल विरोधी कारवाई जारी रहेगी।
 
इजरायल ने 1967 के बाद करीब तीन बार अरब देशो को पश्चिमी किनारा और गाजा देने का प्रस्ताव किया है। 1967 मे राजा हुसैन सुरक्षा कारणो से युद्ध मे भाग लेने से इंकार कर दिया था। युद्ध के समाप्त होने के तुरंत बाद अरब देशो का सम्मेलन खर्तोम मे हुआ हुआ जिसमे तीन बाते कही गयी इजरायल को मानता नही नही देना हैऔर साथा ही साथ उसे  शांति समझौत्ता और वार्त्ता भी नही करना है। यानि अरब मे ऐसे मानसिकता के लोग रह रहे जो इजरायल के अस्तित्व को ही नकारते है। किसी भी सूरत मे यहूदी राष्ट्र इजरायल को मानने को तैयार नही है।  इसकी अगुआई ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद अहमदीनेजाद कर रहे है। यानि ये लोग इस धरती पर इजरायल के नामोनिशान भी है इसको भी मानने से इनकर कर रहे है।मध्य पूर्व के इस घट्ना क्रम से हम यह समझ सकते है कि यह कब्जा का मामला नही है अपितु फिलिस्तीन का मामला है। यह संघर्ष उन दो सभ्यताओ के बीच है जो इजरायल की वैधता को स्वीकार करते है और दूसरा जो नही करते है। यदि आप इसकी जांच करना चाह्ते है आगे बढे मै आपको चुनौती देता हु कि ऐसा प्रस्ताव ले कर आये जिससे मध्य पूर्व मे शांति स्थापित हो सके  जिसमे हमस फतह और हिज्बुल्लाह जैसे संगठनो हथियार डाल दे और इजरायल को एक यहूदी देश के रुप मे स्वीकर कर ले क्या ऐसा सम्भव है नही? यदि आप ऐसा कर सकते है तो मेरे चुनौती को स्वीकार करे और आगे बढे। 

 


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